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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५
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व्यास उवाच
शुचिः स गुणवानासीन्मरुत्तः पृथिवीपतिः |  १४   क
यतमानोऽपि यं शक्रो न विशेषय़ति स्म ह ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति