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स्त्री पर्व
अध्याय १२
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वैशम्पाय़न उवाच
राजा हि यः स्थिरप्रज्ञः स्वय़ं दोषानवेक्षते |  ४   क
देशकालविभागं च परं श्रेय़ः स विन्दति ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति