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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५
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व्यास उवाच
समाश्वसिहि देवेश नाहं मर्त्याय़ कर्हिचित् |  २४   क
ग्रहीष्यामि स्रुवं यज्ञे शृणु चेदं वचो मम ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति