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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५
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व्यास उवाच
वासवोऽप्यसुरान्सर्वान्निर्जित्य च निहत्य च |  ७   क
इन्द्रत्वं प्राप्य लोकेषु ततो वव्रे पुरोहितम् |  ७   ख
पुत्रमङ्गिरसो ज्येष्ठं विप्रश्रेष्ठं वृहस्पतिम् ||  ७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति