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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ५
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धृतराष्ट्र उवाच
भूमौ शय़े जप्यपरो दर्भेष्वजिनसंवृतः |  १२   क
निय़मव्यपदेशेन गान्धारी च यशस्विनी ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति