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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ५
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धृतराष्ट्र उवाच
हतं पुत्रशतं शूरं सङ्ग्रामेष्वपलाय़िनम् |  १३   क
नानुतप्यामि तच्चाहं क्षत्रधर्मं हि तं विदुः |  १३   ख
इत्युक्त्वा धर्मराजानमभ्यभाषत कौरवः ||  १३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति