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शान्ति पर्व
अध्याय २४९
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नारद उवाच
पाणिभ्यां चैव जग्राह तान्यश्रूणि जनेश्वरः |  २२   क
मानवानां हितार्थाय़ यय़ाचे पुनरेव च ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति