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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ५
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धृतराष्ट्र उवाच
आत्मनस्तु हितं मुख्यं प्रतिकर्तव्यमद्य मे |  १८   क
गान्धार्याश्चैव राजेन्द्र तदनुज्ञातुमर्हसि ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति