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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ५
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धृतराष्ट्र उवाच
त्वं हि धर्मभृतां श्रेष्ठः सततं धर्मवत्सलः |  १९   क
राजा गुरुः प्राणभृतां तस्मादेतद्व्रवीम्यहम् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति