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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ५
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धृतराष्ट्र उवाच
अनुज्ञातस्त्वय़ा वीर संश्रय़ेय़ं वनान्यहम् |  २०   क
चीरवल्कलभृद्राजन्गान्धार्या सहितोऽनय़ा |  २०   ख
तवाशिषः प्रय़ुञ्जानो भविष्यामि वनेचरः ||  २०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति