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शान्ति पर्व
अध्याय २८६
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पराशर उवाच
श्रान्तं भीतं भ्रष्टशस्त्रं रुदन्तं; पराङ्मुखं परिवर्हैश्च हीनम् |  ४   क
अनुद्यतं रोगिणं याचमानं; न वै हिंस्याद्वालवृद्धौ च राजन् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति