आश्रमवासिक पर्व  अध्याय ५

धृतराष्ट्र उवाच

सोऽहमेतान्यलीकानि निवृत्तान्यात्मनः सदा |  ८   क
हृदय़े शल्यभूतानि धारय़ामि सहस्रशः ||  ८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति