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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ५
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धृतराष्ट्र उवाच
विशेषतस्तु दह्यामि वर्षं पञ्चदशं हि वै |  ९   क
अस्य पापस्य शुद्ध्यर्थं निय़तोऽस्मि सुदुर्मतिः ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति