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मौसल पर्व
अध्याय ५
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वैशम्पाय़न उवाच
स संनिरुद्धेन्द्रिय़वाङ्मनास्तु; शिश्ये महाय़ोगमुपेत्य कृष्णः |  १९   क
जराथ तं देशमुपाजगाम; लुव्धस्तदानीं मृगलिप्सुरुग्रः ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति