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द्रोण पर्व
अध्याय १५०
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सञ्जय़ उवाच
तामवप्लुत्य जग्राह कर्णो न्यस्य रथे धनुः |  ९१   क
चिक्षेप चैनां तस्यैव स्यन्दनात्सोऽवपुप्लुवे ||  ९१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति