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वन पर्व
अध्याय ८५
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वैशम्पाय़न उवाच
पाञ्चालेषु च कौरव्य कथय़न्त्युत्पलावतम् |  ११   क
विश्वामित्रोऽय़जद्यत्र शक्रेण सह कौशिकः |  ११   ख
यत्रानुवंशं भगवाञ्जामदग्न्यस्तथा जगौ ||  ११   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति