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वन पर्व
अध्याय २२०
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मार्कण्डेय़ उवाच
इच्छाम्यहं त्वय़ा दत्तां प्रीतिं परमदुर्लभाम् |  २   क
तामव्रवीत्ततः स्कन्दः प्रीतिमिच्छसि कीदृशीम् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति