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सभा पर्व
अध्याय ५
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वैशम्पाय़न उवाच
एवं करिष्यामि यथा त्वय़ोक्तं; प्रज्ञा हि मे भूय़ एवाभिवृद्धा |  ११५   क
उक्त्वा तथा चैव चकार राजा; लेभे महीं सागरमेखलां च ||  ११५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति