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सभा पर्व
अध्याय ५
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नारद उवाच
विजय़ो मन्त्रमूलो हि राज्ञां भवति भारत |  १७   क
सुसंवृतो मन्त्रधनैरमात्यैः शास्त्रकोविदैः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति