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सभा पर्व
अध्याय ४
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वैशम्पाय़न उवाच
जङ्घावन्धुश्च रैभ्यश्च कोपवेगश्रवा भृगुः |  १४   क
हरिवभ्रुश्च कौण्डिन्यो वभ्रुमाली सनातनः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति