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सभा पर्व
अध्याय ५
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नारद उवाच
पार्ष्णिमूलं च विज्ञाय़ व्यवसाय़ं पराजय़म् |  ४८   क
वलस्य च महाराज दत्त्वा वेतनमग्रतः ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति