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सभा पर्व
अध्याय ५
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नारद उवाच
कच्चिन्मूलं दृढं कृत्वा यात्रां यासि विशां पते |  ५२   क
तांश्च विक्रमसे जेतुं जित्वा च परिरक्षसि ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति