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सभा पर्व
अध्याय ५
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नारद उवाच
कच्चिल्लवं च मुष्टिं च परराष्ट्रे परन्तप |  ५४   क
अविहाय़ महाराज विहंसि समरे रिपून् ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति