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आदि पर्व
अध्याय ३७
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कृश उवाच
तं स्थाणुभूतं तिष्ठन्तं क्षुत्पिपासाश्रमातुरः |  ७   क
पुनः पुनर्मृगं नष्टं पप्रच्छ पितरं तव ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति