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सभा पर्व
अध्याय ५
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नारद उवाच
कच्चित्स्वनुष्ठिता तात वार्त्ता ते साधुभिर्जनैः |  ६९   क
वार्त्ताय़ां संश्रितस्तात लोकोऽय़ं सुखमेधते ||  ६९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति