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सभा पर्व
अध्याय २४
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वैशम्पाय़न उवाच
सोऽविषह्यतमं ज्ञात्वा कौन्तेय़ं पर्वतेश्वरः |  ८   क
उपावर्तत दुर्मेधा रत्नान्यादाय़ सर्वशः ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति