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वन पर्व
अध्याय ५
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धृतराष्ट्र उवाच
असंशय़ं तेऽपि ममैव पुत्रा; दुर्योधनस्तु मम देहात्प्रसूतः |  १८   क
स्वं वै देहं परहेतोस्त्यजेति; को नु व्रूय़ात्समतामन्ववेक्षन् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति