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वन पर्व
अध्याय ५
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धृतराष्ट्र उवाच
स मा जिह्मं विदुर सर्वं व्रवीषि; मानं च तेऽहमधिकं धारय़ामि |  १९   क
यथेच्छकं गच्छ वा तिष्ठ वा त्वं; सुसान्त्व्यमानाप्यसती स्त्री जहाति ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति