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विराट पर्व
अध्याय ५
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अर्जुन उवाच
समासज्याय़ुधान्यस्यां गच्छामो नगरं प्रति |  १४   क
एवमत्र यथाजोषं विहरिष्याम भारत ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति