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विराट पर्व
अध्याय ५
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वैशम्पाय़न उवाच
ततस्ते दक्षिणं तीरमन्वगच्छन्पदातय़ः |  २   क
वसन्तो गिरिदुर्गेषु वनदुर्गेषु धन्विनः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति