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द्रोण पर्व
अध्याय ७१
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सञ्जय़ उवाच
राजन्सङ्ग्राममाश्चर्यं शृणु कीर्तय़तो मम |  १   क
कुरूणां पाण्डवानां च यथा युद्धमवर्तत ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति