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कर्ण पर्व
अध्याय ३४
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सञ्जय़ उवाच
कर्णोऽपि दृष्ट्वा द्रवतो धार्तराष्ट्रान्पराङ्मुखान् |  ३   क
हंसवर्णान्हय़ाग्र्यांस्तान्प्रैषीद्यत्र वृकोदरम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति