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उद्योग पर्व
अध्याय ५
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वासुदेव उवाच
भवन्तं धृतराष्ट्रश्च सततं वहु मन्यते |  ६   क
आचार्ययोः सखा चासि द्रोणस्य च कृपस्य च ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति