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द्रोण पर्व
अध्याय ५
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सञ्जय़ उवाच
रथस्थं पुरुषव्याघ्रं दृष्ट्वा कर्णमवस्थितम् |  १   क
हृष्टो दुर्योधनो राजन्निदं वचनमव्रवीत् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति