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द्रोण पर्व
अध्याय ५
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सञ्जय़ उवाच
अक्षौहिण्यो दशैका च वशगाः सन्तु तेऽनघ |  २८   क
ताभिः शत्रून्प्रतिव्यूह्य जहीन्द्रो दानवानिव ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति