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द्रोण पर्व
अध्याय ५
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सञ्जय़ उवाच
उग्रधन्वा महेष्वासो दिव्यं विस्फारय़न्धनुः |  ३०   क
अग्रे भवन्तं दृष्ट्वा नो नार्जुनः प्रसहिष्यते ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति