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शल्य पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
तपश्चचार सात्युग्रं निय़मैर्वहुभिर्नृप |  ३   क
भर्ता मे देवराजः स्यादिति निश्चित्य भामिनी ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति