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शल्य पर्व
अध्याय २३
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सञ्जय़ उवाच
अनेकरूपाकृतिभिर्हि वाणै; र्महारथानीकमनुप्रविश्य |  ६४   क
स एव एकस्तव पुत्रसेनां; जघान दैत्यानिव वज्रपाणिः ||  ६४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति