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कर्ण पर्व
अध्याय ५
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धृतराष्ट्र उवाच
केऽरक्षन्दक्षिणं चक्रं सूतपुत्रस्य संय़ुगे |  १०२   क
वामं चक्रं ररक्षुर्वा के वा वीरस्य पृष्ठतः ||  १०२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति