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कर्ण पर्व
अध्याय ५
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धृतराष्ट्र उवाच
स च सर्पमुखो दिव्यो महेषुप्रवरस्तदा |  १०५   क
व्यर्थः कथं समभवत्तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||  १०५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति