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कर्ण पर्व
अध्याय ५
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धृतराष्ट्र उवाच
न मृष्यामि च राधेय़ं हतमाहवशोभिनम् |  १०८   क
यस्य वाह्वोर्वलं तुल्यं कुञ्जराणां शतं शतम् ||  १०८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति