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कर्ण पर्व
अध्याय ५
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धृतराष्ट्र उवाच
यस्य ज्यातलशव्देन शरवृष्टिरवेण च |  १२   क
रथाश्वनरमातङ्गा नावतिष्ठन्ति संय़ुगे ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति