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कर्ण पर्व
अध्याय ५
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धृतराष्ट्र उवाच
स कथं रथिनां श्रेष्ठः कर्णः पार्थेन संय़ुगे |  १४   क
निहतः पुरुषव्याघ्रः प्रसह्यासह्यविक्रमः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति