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कर्ण पर्व
अध्याय ५
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जनमेजय़ उवाच
प्राप्तवान्परमं दुःखं पुत्रव्यसनजं महत् |  २   क
तस्मिन्यदुक्तवान्काले तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति