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द्रोण पर्व
अध्याय १३७
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सञ्जय़ उवाच
ततस्तु सात्यकी राजन्सोमदत्तस्य संय़ुगे |  २८   क
धनुश्चिच्छेद भल्लेन हस्तावापं च पञ्चभिः ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति