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कर्ण पर्व
अध्याय ५
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धृतराष्ट्र उवाच
विषमग्निं प्रपातं वा पर्वताग्रादहं वृणे |  २६   क
न हि शक्ष्यामि दुःखानि सोढुं कष्टानि सञ्जय़ ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति