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कर्ण पर्व
अध्याय ५
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धृतराष्ट्र उवाच
शोकस्यान्तं न पश्यामि समुद्रस्येव विप्लुकाः |  ३२   क
चिन्ता मे वर्धते तीव्रा मुमूर्षा चापि जाय़ते ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति