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कर्ण पर्व
अध्याय ५
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धृतराष्ट्र उवाच
वज्रसारमय़ं नूनं हृदय़ं सुदृढं मम |  ३४   क
यच्छ्रुत्वा पुरुषव्याघ्रं हतं कर्णं न दीर्यते ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति