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कर्ण पर्व
अध्याय ५
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धृतराष्ट्र उवाच
अहमेव पुरा भूत्वा सर्वलोकस्य सत्कृतः |  ३७   क
परिभूतः कथं सूत पुनः शक्ष्यामि जीवितुम् |  ३७   ख
दुःखात्सुदुःखं व्यसनं प्राप्तवानस्मि सञ्जय़ ||  ३७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति