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वन पर्व
अध्याय १७४
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वैशम्पाय़न उवाच
तथैव चान्यानि महावनानि; मृगद्विजानेकपसेवितानि |  ४   क
आलोकय़न्तोऽभिय़युः प्रतीता; स्ते धन्विनः खड्गधरा नराग्र्याः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति